विस्थापितों का दर्द दूर हों...

विस्थापितों का दर्द दूर हों...
टिप्पणी
रतन दवे
जैसलमेर की दो दुल्हनें पाकिस्तान में है। गिराब के बहिया गांव की भी एक दुल्हन पाकिस्तान से नहीं आ पा रही है। पाक विस्थापित परिवारों के कितने ही रिश्तेदान कोरोनाकाल में दोनों देशों के बीच मेे अटक गए है। पाकिस्तान पुलवामा और एयर स्ट्राइक के बाद वीजा देने में आनाकानी करने लग गया और इधर थार एक्सपे्रस बंद होने से भी दोनों देशों के बीच में आने-जाने वालों के लिए सुगम रास्ता बंद हो गया है। बाड़मेर, जैसलमेर, जोधपुर,गंगानगर, बीकानेर में बसे लाखों परिवारों के लिए यह दर्द के दिन है। अपनों से दूरी मजबूरी बना हुआ है। इसके लिए मददगार की तलाश में वे मंत्री-सांसद-विधायकों के चक्कर जरूर काट रहे है लेकिन व्यक्तिगत व्यथा पर कौन ध्यान दें? अर्जियां एक से दूसरे हाथ और एक दफ्तर से दूसरे दफ्तर घूमती-फिरती है और इन लोगों को हासिल कुछ नहीं हो रहा है। यह ऐसा दर्द है जिसका हल सरकार के पास है। पाक विस्थापितों को नागरिकता देने के मामले में जैसे सरकार की ओर से शिविर लगाकर सभी को एक साथ नागरिकता दी जाती है वैसे ही इस तरह के मानवीय संवेदना से जुड़े मामलों की जानकारी जिला कलक्टर के माध्यम से सभी जिलों से मंगवाई जाए कि कोरोनाकाल में पाकिस्तान से लौटने के इंतजार में कितने परिवारों के लोग अटके हुए है। दुल्हनों के नहीं लौटने का मामले तो प्राथमिकता से देखे जाएं। इन मामलों में जिला कलक्टर की रिपोर्ट पर राज्य सरकार केन्द्र तक पैरवी करवाएं और केन्द्र सरकार का गृह मंत्रालय भी इन मामलों में आगे आकर मदद करें। पूर्व विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की संवेदनशीलता ऐसे मौको पर याद आती है कि खुद चलाकर ऐसे मामलों में ट्वीट करना और फिर विदेशों में अटके लोगों को स्वदेश ले आने का उनका अपना जज्बा रहा है। जरूरत ऐसे ही जज्बातों की है। ये परिवार जो अपनों के आने के लिए इंतजार कर रहे है इनकी इतनी पहुंच नहीं है कि वे दिल्ली-जयपुर के दफ्तरों तक बार-बार जाए। उच्चाधिकारियों से मिले। इसके लिए जरूरी है कि जो सरकार में नुमाइंदे है वे इन मामलों की पैरवी अपने हाथ में लें ले। इन परिवारों के लोगों को वापस लाने में मदद की जाए। पूर्व में ऐसा भी हुआ है कि पाकिस्तान की जेलों में कैद लोगों को भी भारत वापसी की राह दोनों देशों नेे मिलकर की है। बाड़मेर में रेशमा के शव का बॉर्डर के गेट खोलकर ले आना दोनों मुल्कों की मानवीयता की नजीर बन चुका है। ऐसी ही सहृदयता की जरूरत इन मामलों में भी है। पाक विस्थापितों की मदद करने वाले सभी संगठनों और व्यक्तियों का साझा प्रयास जब इस मुहिम से जुड़ेगा तो कई घरों में सकून पहुंचेगा। अपने चांद का इंतजार करने वाले परिवार हर टूटते सितारे से यही दुआ करते है कि उनकी प्रार्थना स्वीकार कर ली जाए। यह प्रार्थनाएं तभी स्वीकार होगी जब सरकार इनकी अर्जियों पर गौर करेगी।



source https://www.patrika.com/barmer-news/relieve-the-pain-of-migrants-6512836/

Comments

Popular posts from this blog

बाड़मेर ने निरस्त कर दिए 73757 और लंबित पड़े 20206

​Education Department Rajasthan: पैदल नहीं अब साइकिल चला स्कूल पहुंचेंगी 7. 5 लाख बालिकाएं

बाड़मेर में 2 दिन बाद से फिर सर्दी के तेवर होंगे तेज